सम्पादकीय
“सवाल सत्ता से नहीं, मीडिया से है… आखिर सच की मौत का जिम्मेदार कौन?”
नई दिल्ली | सम्पादकीय डेस्क
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान कैमरे में एक अजीब तस्वीर कैद हुई। भीड़ का गुस्सा किसी मीडिया मालिक पर नहीं, बल्कि उस रिपोर्टर पर उतर रहा था जो धूप में खड़ा होकर लाइव रिपोर्टिंग कर रहा था। एसी दफ्तरों में बैठे लोग सुरक्षित थे, लेकिन गालियाँ, धक्के और अपमान उस पत्रकार के हिस्से आए, जो केवल अपना काम कर रहा था। सवाल यह है कि पत्रकारिता का सबसे बड़ा बोझ आखिर हमेशा सबसे छोटे पत्रकार के कंधों पर ही क्यों होता है?
जब एक पत्रकार साथी से पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर बात हुई, तो उसकी बातों में दर्द साफ झलक रहा था। उसने कहा—”हम सच दिखाना चाहते हैं, लेकिन कई बार हमारी खबर किसी एक फोन, किसी एक दबाव या किसी एक आदेश के आगे दम तोड़ देती है। हमारी मजबूरी घर चलाना है। बच्चों की फीस, बिजली-पानी का बिल और परिवार की जिम्मेदारियाँ हमें चुप रहने पर मजबूर कर देती हैं।” यह सिर्फ एक पत्रकार की कहानी नहीं, बल्कि शायद पूरे पेशे का मौन संघर्ष है।
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन जब स्तंभों पर ही मुनाफे का रंग चढ़ जाए, तब सच का वजन हल्का पड़ने लगता है। बड़े मीडिया घरानों की चमक-दमक जितनी बढ़ी है, उतने ही सवाल उनकी संपादकीय स्वतंत्रता पर भी उठे हैं। क्या खबर अब जनता के लिए बनती है, या फिर उन लोगों के लिए जिनके पास सत्ता, पैसा और प्रभाव है?
विडंबना देखिए… जब कोई पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता है, तो उसे देशद्रोही, पक्षपाती या एजेंडा चलाने वाला कह दिया जाता है। और जब वही पत्रकार सवाल पूछना बंद कर देता है, तो उसे बिकाऊ कह दिया जाता है। आखिर इस व्यवस्था में ईमानदार पत्रकार जाए तो जाए कहाँ? सच लिखे तो संकट, चुप रहे तो आत्मा परेशान।
इतिहास गवाह है कि इस देश में अनेक पत्रकारों ने सच की कीमत अपनी नौकरी, अपने सम्मान और कभी-कभी अपनी जान देकर चुकाई है। आज भी कई पत्रकार सीमित संसाधनों में जनता की आवाज़ बनने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यदि उनकी मेहनत न्यूज़रूम से निकलने से पहले ही दबा दी जाए, तो दोष केवल मैदान में खड़े रिपोर्टर का नहीं हो सकता।
यह सम्पादकीय किसी एक चैनल, किसी एक मालिक या किसी एक सरकार पर आरोप नहीं लगाता। लेकिन यह सवाल जरूर पूछता है कि क्या मीडिया का उद्देश्य सत्ता से सवाल पूछना है या सत्ता के हिसाब से सवाल तय करना? यदि खबरों की दिशा न्यूज़रूम नहीं, बल्कि प्रभावशाली गलियारों में तय होने लगे, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है, जब समाज भी सच सुनने के बजाय अपनी पसंद का सच तलाशने लगता है। उस दिन पत्रकारिता एक मिशन नहीं, बल्कि केवल कारोबार बनकर रह जाएगी। कैमरा चलता रहेगा, माइक्रोफोन भी खुले रहेंगे, लेकिन सच शायद कहीं बंद कमरों में कैद हो जाएगा।
आज जरूरत किसी एक पत्रकार को दोष देने की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था से सवाल पूछने की है। क्योंकि यदि कलम डर गई, कैमरा झुक गया और सच बिक गया, तो लोकतंत्र की हार संसद में नहीं, न्यूज़रूम में होगी। और उस दिन पत्रकारिता का हाल कहीं उस सर्कस के जोकर जैसा न हो जाए, जो केवल वही करता है जो उसका मालिक चाहता है।
