सवाल सत्ता से नहीं, मीडिया से है—आख़िर सच दिखाएगा कौन?
जंतर-मंतर के बाद सबसे बड़ा सवाल: क्या भारतीय मीडिया अपनी आत्मा खो चुकी है?
क्या आज भारतीय मीडिया के लिए ‘ब्लैक डे’ है?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, उसके बाद देश में दो तस्वीरें सामने आईं। एक तस्वीर सोशल मीडिया पर दिखाई दी, दूसरी मुख्यधारा की मीडिया के बड़े हिस्से में। सवाल यह नहीं है कि कौन पूरी तरह सही था और कौन पूरी तरह गलत। सवाल यह है कि क्या देश की पत्रकारिता अपने सबसे महत्वपूर्ण दायित्व—सत्ता से सवाल पूछने—से दूर होती जा रही है?
पत्रकारिता का धर्म सरकार का प्रचार करना नहीं, जनता को सच दिखाना है। लेकिन आज ऐसा महसूस होता है कि टीआरपी, विज्ञापन, राजनीतिक समीकरण और कॉर्पोरेट हित कई बार पत्रकारिता की आत्मा पर भारी पड़ रहे हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब किसी घटना के अनेक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आ जाते हैं, तब मुख्यधारा की मीडिया का बड़ा हिस्सा उन सवालों से बचता हुआ क्यों दिखाई देता है? क्या कैमरे केवल वही रिकॉर्ड करेंगे जो सत्ता को असुविधाजनक न लगे? क्या बहसें केवल वही होंगी जो पहले से तय हों?
विडंबना यह है कि जिन सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों को कभी “अविश्वसनीय” कहकर खारिज किया जाता था, आज वही कई घटनाओं की पहली झलक जनता तक पहुँचा रहे हैं। यह भी सच है कि सोशल मीडिया पर गलत सूचनाएँ भी फैल सकती हैं, इसलिए हर सामग्री की तथ्य-जांच आवश्यक है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यदि मुख्यधारा की मीडिया जनता का विश्वास खोती रही, तो लोग वैकल्पिक माध्यमों की ओर और तेज़ी से बढ़ेंगे।
सबसे पीड़ादायक दृश्य तब होता है जब विदेशी पत्रकार घटनास्थल से सवाल पूछते दिखाई देते हैं और भारतीय मीडिया का एक हिस्सा उन सवालों से बचता हुआ प्रतीत होता है। इससे केवल किसी चैनल की नहीं, बल्कि भारतीय पत्रकारिता की सामूहिक साख पर प्रश्नचिह्न लगता है।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि पत्रकार सरकार के विरोधी बनें। आवश्यकता इस बात की है कि वे केवल जनता के पक्षधर बनें। सत्ता कोई भी हो—उससे प्रश्न पूछना ही पत्रकारिता है। यदि सवाल पूछना बंद हो जाए, तो कैमरा केवल रिकॉर्डिंग मशीन रह जाता है, पत्रकारिता नहीं।
क्या आज का दिन भारतीय पत्रकारिता के लिए “ब्लैक डे” कहा जाना चाहिए? इसका निर्णय इतिहास करेगा। लेकिन इतना निश्चित है कि यदि मीडिया जनता का विश्वास खो देता है, तो उसे वापस पाने में वर्षों लग जाते हैं।
आज हर पत्रकार को स्वयं से केवल तीन प्रश्न पूछने चाहिए—
क्या मैं सच दिखा रहा हूँ?
क्या मैं हर सत्ता से समान दूरी बनाए हुए हूँ?
क्या मेरी पहली निष्ठा जनता के प्रति है या किसी सत्ता, संस्था या स्वार्थ के प्रति?
यदि इन तीनों प्रश्नों का उत्तर “हाँ” नहीं है, तो आत्ममंथन का समय आ चुका है।
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। यदि यही स्तंभ कमजोर पड़ गया, तो लोकतंत्र की पूरी इमारत हिलने लगेगी। इसलिए आज सबसे अधिक आवश्यकता किसी पक्ष की नहीं, बल्कि सत्य की है। और सत्य का कोई राजनीतिक दल नहीं होता।
