15 सितंबर
प्रदेश में गौवंश में फैलने वाले वायरस जनित रोग लम्पी स्किन डिजीज के संक्रमण की रोकथाम के लिए पशुपालन विभाग द्वारा विशेष अभियान चलाया जा रहा है। पूर्वी राजस्थान के 10 जिलों में संक्रमण सामने आने के बाद विभाग पूरी तरह सतर्क है। विभाग की तत्पर कार्रवाई एवं व्यापक स्तर पर किए जा रहे टीकाकरण के चलते स्थिति नियंत्रण में है। हालांकि, संक्रमण का खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है। इसे देखते हुए विभाग द्वारा रोग के नियंत्रण एवं रोकथाम के लिए लगातार प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं।
पशुपालन विभाग के निदेशक डॉ. सुरेश चंद मीना ने बताया कि विभाग का प्रयास है कि अप्रभावित जिलों में लम्पी स्किन डिजीज का संक्रमण न फैलने पाए तथा प्रभावित जिलों में संक्रमित गौवंश को जल्द से जल्द स्वस्थ किया जा सके। इसके लिए सभी प्रभावित जिलों में क्वारेंटाइन सेंटर स्थापित किए गए हैं, जहां संक्रमित पशुओं को अलग रखकर उनका उपचार किया जा रहा है। इससे संक्रमित पशुओं की संख्या में लगातार कमी आ रही है। उन्होंने बताया कि मंगलवार को डीग एवं भरतपुर में कुछ नए मामले सामने आए हैं, जबकि अन्य स्थानों पर कोई नया मामला सामने नहीं आया।
गांव-गांव जाकर जागरूक कर रही विभागीय टीमें
डॉ. मीना ने बताया कि विभागीय टीमें गांव-गांव जाकर पशुपालकों को रोग के प्रति जागरूक करने के साथ संक्रमित पशुओं का उपचार भी कर रही हैं। पशुपालकों की जागरूकता एवं विभाग की सतत निगरानी से बीमारी को नियंत्रित करने में सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं।
उन्होंने पशुपालकों से अपील की कि पशुओं में रोग के प्रारंभिक लक्षण, जैसे त्वचा पर गांठें, बुखार, सुस्ती अथवा अन्य असामान्य लक्षण दिखाई देने पर तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सा संस्था से संपर्क करें और उपचार शुरू करवाएं। संक्रमित पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि समय पर पहचान, संक्रमित पशु का पृथक्करण, चिकित्सकीय उपचार एवं स्वच्छता लम्पी रोग के नियंत्रण के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम हैं।
स्वच्छता एवं वाहक कीटों की रोकथाम पर जोर
पशुपालन निदेशक ने बताया कि लम्पी रोग का कोई एक निश्चित उपचार नहीं है। प्रभावित पशु को लक्षणों के आधार पर आवश्यक एवं सहायक उपचार उपलब्ध कराया जाता है। पशु को पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पेयजल, पौष्टिक आहार एवं आराम उपलब्ध करवाना भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने पशुपालकों से विशेष रूप से आग्रह किया कि संक्रमित पशुओं को खुले में अथवा अन्य स्वस्थ पशुओं के साथ रखने से बचें। साथ ही मक्खी-मच्छर जैसे वाहक कीटों की रोकथाम के लिए पशु आवास एवं आसपास के क्षेत्रों में साफ-सफाई एवं स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। उन्होंने आवश्यकता के अनुसार दवा के छिड़काव एवं फॉगिंग की व्यवस्था करने की भी अपील की, ताकि वाहक कीटों की संख्या को नियंत्रित किया जा सके और संक्रमण के प्रसार को रोका जा सके।
