उदयपुर में दिनेश भट्ट को उपमहापौर बनाने के पीछे भाजपा की कौन-सी राजनीतिक चाल? 55 से 56 वोट तक पहुंची कहानी में छिपे कई सवाल
उदयपुर। नगर निगम में पारस सिंघवी को महापौर और उसके अगले ही दिन दिनेश भट्ट को उपमहापौर बनाए जाने के बाद उदयपुर भाजपा की राजनीति में एक नया अध्याय खुल गया है। महापौर चुनाव में भाजपा के पारस सिंघवी को 55 वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस की पूनम कुंवर राठौड़ को 25 वोट मिले। भाजपा के 53 पार्षदों के साथ दो निर्दलीय पार्षदों का समर्थन सिंघवी को मिला। इसके ठीक अगले दिन उपमहापौर चुनाव में दिनेश भट्ट को 56 और कांग्रेस के लक्ष्मीनारायण मेघवाल को 24 वोट मिले। यहीं से सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल पैदा होता है—महापौर से एक वोट ज्यादा दिनेश भट्ट के खाते में कहां से आया? इसका आधिकारिक जवाब मतदान के आंकड़ों में है, लेकिन उस अतिरिक्त वोट को किसी विशेष व्यक्ति, गुट या असंतुष्ट खेमे से जोड़ने का फिलहाल कोई प्रमाण सार्वजनिक नहीं है। इसलिए सवाल जरूर उठता है, लेकिन निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
महापौर पद के फैसले से पहले भाजपा के भीतर दिनेश भट्ट और प्रमोद सामर सहित कई नामों पर मंथन की खबरें सामने आई थीं। यहां तक कि भाजपा पार्षदों से पसंदीदा नाम लिखवाकर रायशुमारी किए जाने की बात भी सामने आई। अंततः पार्टी ने पारस सिंघवी को उम्मीदवार बनाया और उन्होंने 55 वोट लेकर महापौर पद हासिल कर लिया। इसके बाद दिनेश भट्ट को उपमहापौर बनाए जाने को केवल ‘अनुभव का सम्मान’ कहकर छोड़ देना शायद पूरी राजनीतिक तस्वीर को छोटा कर देना होगा। भट्ट लंबे समय तक भाजपा के शहर जिलाध्यक्ष रहे हैं और संगठन में उनकी भूमिका रही है। ऐसे में भाजपा के सामने दो रास्ते थे—एक तरफ नए चेहरे को महापौर की जिम्मेदारी देकर नेतृत्व परिवर्तन का संदेश देना और दूसरी तरफ पुराने संगठनात्मक चेहरे को पूरी तरह हाशिये पर जाने से रोकना। क्या उपमहापौर का फैसला इसी राजनीतिक संतुलन का हिस्सा है? यह सवाल अब उदयपुर भाजपा की अंदरूनी राजनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण हो गया है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि महापौर चुनाव से पहले ही भाजपा के भीतर संभावित क्रॉस-वोटिंग और असंतोष को लेकर चर्चाएं थीं। कुछ रिपोर्टों में तो दिनेश भट्ट और अन्य वरिष्ठ नेताओं के नामों के बीच पार्टी के भीतर चल रहे मंथन तथा भट्ट की तबीयत बिगड़ने तक की जानकारी सामने आई थी। ऐसे माहौल के बाद भट्ट को उपमहापौर की कुर्सी मिलना निश्चित रूप से राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसे भाजपा चाहे संगठनात्मक अनुभव का सम्मान बताए, सामाजिक संतुलन कहे या पार्टी के भीतर सभी प्रमुख धड़ों को साथ लेकर चलने की रणनीति—तीनों व्याख्याओं में एक बात समान है: भाजपा ने महापौर और उपमहापौर के पदों को दो अलग-अलग राजनीतिक संदेशों के लिए इस्तेमाल किया है। एक तरफ पारस सिंघवी के रूप में अपेक्षाकृत नया राजनीतिक संतुलन, दूसरी तरफ दिनेश भट्ट के रूप में संगठन का अनुभव।
लेकिन यही मामला भाजपा के उस राजनीतिक सिद्धांत पर भी सवाल खड़ा करता है जिसमें पार्टी अक्सर संगठनात्मक अनुशासन और विरोध के बीच स्पष्ट सीमा की बात करती है। भारतीय राजनीति में यह विरोधाभास नया नहीं है। भाजपा हो, कांग्रेस हो या कोई अन्य दल—जब कोई नेता चुनाव के समय पार्टी के लिए चुनौती बनता है तो उसे ‘बागी’ कहा जाता है, लेकिन वही नेता राजनीतिक रूप से उपयोगी हो जाए तो उसके अनुभव, जनाधार और संगठनात्मक क्षमता की नई व्याख्या सामने आ जाती है। पिछले वर्षों में अलग-अलग दलों के नेताओं का दल-बदल और फिर उन्हीं नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलना भारतीय राजनीति की स्थापित प्रवृत्ति रही है। इसलिए उदयपुर की कहानी को केवल भाजपा बनाम कांग्रेस के रूप में देखना अधूरा होगा; यह भारतीय राजनीति के उस बड़े मॉडल का स्थानीय उदाहरण भी है, जहां विचारधारा के साथ-साथ चुनावी गणित, सामाजिक समीकरण और संगठन के भीतर शक्ति-संतुलन भी निर्णयों को प्रभावित करते हैं।
अब सवाल उस सामाजिक और राजनीतिक समीकरण का भी है जिसे उदयपुर भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम में साधने की कोशिश की है। पारस सिंघवी को महापौर बनाने के बाद भाजपा ने एक अलग सामाजिक प्रतिनिधित्व वाला चेहरा आगे किया, जबकि दिनेश भट्ट को उपमहापौर बनाकर संगठन के अनुभवी नेतृत्व को साथ रखा। क्या यह आने वाले वर्षों के लिए भाजपा की नई ‘बैलेंस पॉलिटिक्स’ है? क्या पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि वह नए चेहरों को भी आगे करेगी और पुराने संगठनात्मक नेताओं को भी राजनीतिक रूप से सक्रिय रखेगी? और क्या यह रणनीति उन संभावित नाराज कार्यकर्ताओं को भी संदेश है कि पार्टी में असहमति के बावजूद संगठन में भूमिका की संभावना खत्म नहीं होती? इन सवालों का उत्तर भाजपा नेतृत्व ही बेहतर दे सकता है, लेकिन पदों का यह संयोजन निश्चित रूप से राजनीतिक संकेतों से खाली नहीं है।
आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या दिनेश भट्ट को उपमहापौर बनाना सिर्फ एक प्रशासनिक नियुक्ति थी या भाजपा की सोची-समझी राजनीतिक कूटनीति? अगर यह केवल अनुभव का सम्मान था तो पार्टी ने इसी समय, इसी पद के लिए भट्ट को क्यों चुना? अगर यह सामाजिक संतुलन था तो क्या आने वाले समय में ऐसे और राजनीतिक संतुलन देखने को मिलेंगे? और अगर यह संगठन के भीतर संभावित असंतोष को शांत करने की रणनीति थी तो क्या भाजपा ने उदयपुर में यह स्वीकार कर लिया है कि चुनाव जीतना और संगठन को एकजुट रखना दो अलग-अलग राजनीतिक चुनौतियां हैं? 55 वोट से महापौर और 56 वोट से उपमहापौर का यह अंतर संख्या में भले ही सिर्फ एक वोट हो, लेकिन राजनीति में कभी-कभी एक वोट भी पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल बन जाता है। अभी इसका जवाब किसी आरोप में नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में भाजपा के संगठनात्मक फैसलों में दिखाई देगा।
