मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि सरकार के फैसलों की आलोचना करना, शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन करना या सरकार विरोधी नारे लगाना किसी भी नागरिक को शहर से तड़ीपार (एक्सटर्न) करने का वैध आधार नहीं बन सकता। जस्टिस माधव जामदार की एकल पीठ ने यह टिप्पणी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महाराष्ट्र महासचिव के खिलाफ जारी तड़ीपार आदेश को रद्द करते हुए की।
मामला दिसंबर 2025 का है, जब मुंबई पुलिस की जोन-6 की डिप्टी कमिश्नर ने याचिकाकर्ता को एक साल के लिए मुंबई से बाहर रहने का आदेश दिया था। यह कार्रवाई नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी, बाबरी मस्जिद विवाद और ज्ञानवापी मस्जिद मामले को लेकर आयोजित प्रदर्शनों में शामिल होने के आधार पर हुई थी। कोंकण डिवीजन के डिवीजनल कमिश्नर ने भी इस आदेश को अपील में बरकरार रखा था, जिसके बाद पीड़ित व्यक्ति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को न सिर्फ अपनी राय व्यक्त करने की स्वतंत्रता है, बल्कि गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार भी है। पीठ ने माना कि केवल केंद्र सरकार के फैसलों का विरोध करने पर याचिकाकर्ता को तड़ीपार करना उसके इन्हीं मौलिक अधिकारों का हनन है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि तड़ीपार जैसा कदम एक असाधारण उपाय है, जो किसी नागरिक को देश में कहीं भी स्वतंत्र आवागमन के अधिकार से वंचित कर देता है, इसलिए इसका इस्तेमाल बेहद सावधानी से किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने पुलिस के रवैये पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह लोकसेवक हैं, न कि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के निजी कर्मचारी। कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 56 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि तड़ीपार तभी किया जा सकता है जब यह साबित हो कि संबंधित व्यक्ति की गतिविधियां लोगों या संपत्ति को वास्तविक खतरा, नुकसान या भय पहुंचा रही हैं। इस मामले में ऐसा कोई ठोस सबूत रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था, जबकि याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज मामले मुख्यतः बिना अनुमति प्रदर्शन करने से जुड़ी मामूली धाराओं के तहत थे।
कोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले और गुजरात हाईकोर्ट के एक अन्य निर्णय का भी हवाला दिया, जिनमें कहा गया था कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की शक्तियों का इस्तेमाल वैध असहमति या शिकायतों को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। इन नजीरों के आधार पर अदालत ने माना कि पुलिस की कार्रवाई प्रथमदृष्टया दुर्भावनापूर्ण प्रतीत होती है और इसका मकसद आगामी नागरिक चुनावों से पहले याचिकाकर्ता को दूर रखना था।
अंततः हाईकोर्ट ने दिसंबर 2025 के तड़ीपार आदेश और मार्च 2026 के अपीलीय आदेश, दोनों को रद्द कर दिया। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रतिरोध के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण नजीर बनेगा और यह भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में असहमति के अधिकार की पुष्टि करता है।
