7 सितंबर 2026
जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर का अष्टम दीक्षान्त समारोह सोमवार को आयोजित किया गया। समारोह को संबोधित करते हुए राज्यपाल एवं कुलाधिपति श्री हरिभाऊ बागडे ने कहा कि विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित शिक्षा नहीं दी जानी चाहिए, बल्कि उन्हें जीवन से जुड़ी ऐसी शिक्षा भी मिलनी चाहिए, जो उनके भीतर विवेक और जागरूकता विकसित करे।
राज्यपाल ने कहा कि ऐसी शिक्षा से विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता का विकास होगा और वे विवेकवान नागरिक बन सकेंगे। उन्होंने संस्कृत के अधिकाधिक प्रयोग पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी भाषा का बार-बार प्रयोग उसे जनभाषा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संस्कृत को प्राचीनतम भाषाओं में से एक बताते हुए उन्होंने कहा कि यह श्रुति एवं मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ियों तक आगे बढ़ी है।
उन्होंने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में विज्ञान, शिक्षा और ज्ञान की समृद्ध परंपरा रही है। नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को जलाए जाने का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पुस्तकों को जलाया जा सकता है, लेकिन ज्ञान को समाप्त नहीं किया जा सकता। लोगों ने ज्ञान को अपने भीतर सुरक्षित रखा और उसे आगे बढ़ाया।
राज्यपाल ने भारतीय ज्ञान परंपरा को उचित सम्मान देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत के प्राचीन ज्ञान और उपलब्धियों को लंबे समय तक उचित पहचान नहीं मिली। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में भारतीय संस्कृति, इतिहास और ज्ञान परंपरा को पर्याप्त स्थान दिए जाने की आवश्यकता बताई।
संत-महात्माओं के जीवन का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि उनका जीवन व्यक्तिगत हित के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज के कल्याण के लिए समर्पित होता है। उन्होंने जगद्गुरु रामानंदाचार्य के प्रसिद्ध संदेश “जात पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई” का स्मरण करते हुए सामाजिक समरसता का संदेश दिया।
राज्यपाल ने संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रणेता नारायणदासजी महाराज को दूरदर्शी बताते हुए कहा कि संस्कृत विश्वविद्यालय उनकी भविष्य की ज्ञान-दृष्ट
