11 सितंबर
मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा के निर्देश पर प्रदेश में लंपी स्किन डिजीज की स्थिति की समीक्षा एवं प्रभावी नियंत्रण के लिए शुक्रवार को पशुपालन विभाग के प्रमुख शासन सचिव श्री विकास सीतारामजी भाले की अध्यक्षता में बैठक आयोजित की गई। बैठक पशुधन भवन स्थित राजस्थान राज्य पशुधन विकास बोर्ड के सभागार में हुई।
बैठक में लंपी रोग की वर्तमान स्थिति, प्रभावित क्षेत्रों में किए जा रहे सर्वेक्षण, टीकाकरण और उपचार व्यवस्था की समीक्षा की गई। प्रमुख शासन सचिव ने अधिकारियों को रोग की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए सभी आवश्यक कदम प्रभावी और समयबद्ध रूप से उठाने के निर्देश दिए।
प्रभावित क्षेत्रों में जागरूकता और चिकित्सा व्यवस्था पर जोर
श्री भाले ने कहा कि प्रभावित क्षेत्रों में पशुपालकों को लंपी रोग के लक्षण, बचाव और उपचार के संबंध में आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई जाए। साथ ही, पशु चिकित्सा संस्थानों के माध्यम से आवश्यक चिकित्सा सेवाएं सुनिश्चित की जाएं।
उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि जिन जिलों में अभी तक लंपी रोग के मामले सामने नहीं आए हैं, वहां विशेष फोकस रखते हुए ऐसी प्रभावी व्यवस्था की जाए, जिससे बीमारी का प्रसार रोका जा सके।
उन्होंने विभिन्न माध्यमों से व्यापक प्रचार-प्रसार कर पशुपालकों को लंपी रोग के प्रति जागरूक करने के निर्देश भी दिए।
घर-घर सर्वेक्षण और सतत निगरानी के निर्देश
प्रमुख शासन सचिव ने पशु चिकित्सा अधिकारियों को घर-घर जाकर बीमार पशुओं का सर्वेक्षण करने के निर्देश दिए। उन्होंने जिला स्तर पर सतत निगरानी बनाए रखने तथा विभागीय अधिकारियों को अन्य संबंधित विभागों के साथ बेहतर समन्वय से कार्य करने के लिए कहा।
बैठक में अधिकारियों ने लंपी रोग की वर्तमान स्थिति और विभाग द्वारा किए जा रहे नियंत्रणात्मक उपायों की जानकारी दी।
10 जिले प्रभावित, अब तक 16 पशुओं की मौत
पशुपालन निदेशक डॉ. सुरेश चंद मीना ने बताया कि वर्तमान में प्रदेश के 10 जिले लंपी रोग से प्रभावित हैं, जिनमें अधिकांश जिले पूर्वी राजस्थान के हैं। उन्होंने बताया कि सक्रिय संक्रमित गौवंश की संख्या लगातार कम हो रही है। अब तक 16 पशुओं की लंपी रोग से मृत्यु हुई है।
उन्होंने बताया कि पशुओं के आवागमन को नियंत्रित करने के लिए पशु मेले और पशु हाट पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसके साथ ही राज्य एवं जिला स्तर पर नियंत्रण कक्ष तथा त्वरित प्रतिक्रिया टीमों का गठन किया गया है।
पशुपालकों में जागरूकता बढ़ाने के लिए विभिन्न माध्यमों से प्रचार-प्रसार सामग्री का उपयोग भी किया जा रहा है, ताकि बीमारी के लक्षण सामने आने पर समय रहते आवश्यक उपचार एवं बचाव के कदम उठाए जा सकें।
