उदयपुर नगर निगम चुनाव 2026 में वार्ड 45 से भाजपा के दिनेश चन्द्र भट्ट ने 1,540 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। 70 वर्षीय भट्ट की जीत केवल एक पार्षद की जीत नहीं मानी गई, बल्कि इसे उनके लंबे राजनीतिक अनुभव और शहर की राजनीति में उनकी पकड़ से जोड़कर देखा गया। चुनाव से पहले ही उनका नाम मेयर पद के प्रमुख दावेदारों में शामिल था। उदयपुर की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय भट्ट को कई लोग भाजपा का ‘भीष्म’ या ‘भीष्म पितामह’ तक कहते रहे हैं। ऐसे में जब उन्होंने वार्ड 45 से चुनाव जीता, तो शहर के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि इस बार निगम की कमान शायद अनुभवी हाथों में जाएगी।
लेकिन राजनीति में केवल अनुभव और वरिष्ठता ही अंतिम फैसला नहीं करती। उदयपुर में भाजपा ने 80 में से स्पष्ट बहुमत हासिल किया और उसके बाद मेयर पद को लेकर पार्टी के भीतर मंथन शुरू हुआ। पार्षदों से पसंदीदा नामों को लेकर राय भी जानी गई। उस समय दिनेश भट्ट और प्रमोद सामर के नाम प्रमुखता से सामने आ रहे थे, जबकि पारस सिंघवी और पंकज बोराणा भी चर्चा में थे। यानी मुकाबला किसी एक नाम तक सीमित नहीं था। भट्ट के नाम को लेकर पार्टी के भीतर समर्थन जुटाने की चर्चाएं भी सामने आईं, लेकिन अंतिम समय में समीकरण बदलते चले गए।
और फिर आया वह मोड़, जिसने उदयपुर की सियासत में कई सवाल खड़े कर दिए। भाजपा ने आखिरकार पारस सिंघवी को मेयर पद का प्रत्याशी घोषित कर दिया और उन्होंने नामांकन भी दाखिल कर दिया। यही वह क्षण था जब लंबे समय से मेयर पद के मजबूत दावेदार माने जा रहे दिनेश भट्ट इस दौड़ से बाहर दिखाई दिए। मीडिया रिपोर्टों में भट्ट और सामर के बीच सहमति न बनने तथा पार्टी के भीतर अलग-अलग स्तर पर चल रही राजनीतिक कवायद का उल्लेख हुआ है। हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि भट्ट को किन वजहों से अंतिम रूप से नहीं चुना गया, क्योंकि भाजपा ने अपने निर्णय के पीछे कोई विस्तृत आधिकारिक कारण सार्वजनिक नहीं किया है।
सवाल इसलिए भी बड़ा है कि जिस व्यक्ति के पास वर्षों का राजनीतिक अनुभव हो, जिसे संगठन और शहर की राजनीति की गहरी समझ रखने वाला नेता माना जाता हो, और जिसके नाम की मेयर पद के लिए लगातार चर्चा होती रही हो, वह अंतिम क्षण में क्यों पीछे रह गया? क्या इस बार पार्टी के लिए वरिष्ठता से ज्यादा दूसरे राजनीतिक समीकरण महत्वपूर्ण रहे? क्या अलग-अलग नेताओं के समर्थन और संगठन के भीतर बने समीकरणों ने अंतिम निर्णय को प्रभावित किया? या फिर भाजपा नेतृत्व ने मेयर के लिए ऐसी राजनीतिक गणित को प्राथमिकता दी, जिसमें अनुभव के साथ अन्य समीकरण भी निर्णायक रहे? इन सवालों के जवाब फिलहाल सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हैं। इतना जरूर है कि दिनेश भट्ट का वार्ड 45 जीतना और मेयर पद की दौड़ से बाहर होना—उदयपुर की इस चुनावी कहानी के दो सबसे महत्वपूर्ण और एक-दूसरे से बिल्कुल अलग अध्याय बन गए हैं।
उदयपुर की राजनीति में दिनेश भट्ट की कहानी इसलिए भी मार्मिक है कि एक लंबी राजनीतिक पारी के बाद जिस कुर्सी की चर्चा उनके नाम के साथ सबसे ज्यादा हो रही थी, वह उनके सामने आकर भी दूर चली गई। हालांकि राजनीति का अध्याय यहां खत्म नहीं होता। मेयर पद के लिए पारस सिंघवी का नाम आगे आने के बाद अब निगाहें 21 सितंबर के औपचारिक चुनाव और इसके बाद निगम की नई सत्ता-संरचना पर हैं। वहीं भट्ट के लिए अगला सवाल यह होगा कि पार्टी उन्हें किस भूमिका में देखती है। उनके नाम को लेकर उप महापौर पद की चर्चा भी सामने आई है, लेकिन उस पर भी अंतिम आधिकारिक फैसला अभी बाकी है। उदयपुर की जनता के लिए शायद सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा—क्या राजनीति में अनुभव और वर्षों की तपस्या कभी-कभी भीष्म की तरह सम्मान तो दिलाती है, लेकिन सत्ता का मुकुट किसी और के सिर पर चला जाता है?
