सोटा, लोटा और लंगोटा लेकर चुनावी मैदान में उतरे दावेदार; अब चर्चा है—महापौर की कुर्सी का फैसला उदयपुर करेगा या पंजाब से आएगा आदेश?
उदयपुर नगर निगम और पंचायती राज चुनाव 2026 की आहट अभी पूरी तरह सुनाई भी नहीं दी कि सियासी गलियारों में दौड़ शुरू हो गई है। बोर्ड बनने से पहले ही बोर्ड की कल्पना, महापौर बनने से पहले ही समर्थकों की गिनती और टिकट मिलने से पहले ही शक्ति प्रदर्शन शुरू हो चुका है। चुनावी मौसम ऐसा है कि नेताओं के कदमों में अचानक स्प्रिंग लग गई है—कोई सुबह दौड़ रहा है, कोई रात में और कोई आधी रात को भी राजनीतिक फिटनेस का प्रदर्शन कर रहा है।
कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि इस बार कुछ दावेदार सोटा, लोटा और लंगोटा तीनों साथ लेकर मैदान में उतरे हैं। सोटा यानी राजनीतिक दबदबा, लोटा यानी जहां लाभ दिखे वहां लुढ़कने की कला और लंगोटा यानी मैदान न छोड़ने का संकल्प! रिश्तेदारी भी सक्रिय है और राजनीति भी। कोई भाई को साध रहा है, कोई रिश्तेदार को, कोई साले को तो कोई जीजा को। मकसद एक ही—किसी तरह राजनीतिक गणित में अपना अंक सबसे बड़ा साबित करना।
उदयपुर की राजनीति में पुराने चेहरों की भी अचानक सक्रियता दिखाई देने लगी है। जिन चेहरों को कभी भाजपा की राजनीति का विरोधी, आलोचक या उसके लिए परेशानी खड़ी करने वाला माना जाता था, वे अब नए राजनीतिक समीकरणों में भाजपा के हितैषी दिखाई देने लगे हैं। कल तक जिनके सुर अलग थे, आज सुर मिलते नजर आ रहे हैं। राजनीति में इसे विचारधारा का परिवर्तन कहें, समय की मांग कहें या फिर कुर्सी का चुंबकीय आकर्षण—फैसला जनता ही करेगी।
इधर महापौर की कुर्सी को लेकर दावेदारी का खेल भी दिलचस्प हो गया है। कोई खुद के लिए रास्ता बना रहा है तो कोई अपने चहेते के लिए जमीन तैयार कर रहा है। पर्दे के पीछे बैठकों का दौर, फोन कॉल का दौर और मुलाकातों का दौर जारी है। दिन में मुलाकात हो तो राजनीतिक शिष्टाचार, रात में हो तो रणनीति और आधी रात में हो तो शायद चुनावी विज्ञान का कोई नया अध्याय!
लेकिन इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा चर्चा एक और कयास की है—क्या उदयपुर के नगर निगम चुनाव में पंजाब की राजनीति का भी कोई प्रभाव दिखाई देगा? राजनीतिक गलियारों में ऐसी चर्चाएं और अफवाहें तैर रही हैं कि राजस्थान के इस स्थानीय चुनाव में दूसरे राज्य के कुछ राजनीतिक चेहरे या उनके संपर्क किसी न किसी रूप में भूमिका निभा सकते हैं। फिलहाल यह बात आधिकारिक तथ्य नहीं, बल्कि राजनीतिक चर्चाओं और कयासों का हिस्सा है; इसलिए इसकी सच्चाई का फैसला समय और घटनाक्रम ही करेगा।
मगर सवाल बड़ा है—अगर उदयपुर की महापौर की कुर्सी के लिए राजनीतिक रणनीति उदयपुर से बाहर बैठकर बनने लगे, तो फिर उदयपुर के मतदाता किसे चुनेंगे और किसे चुना जाएगा, इसमें फर्क कितना रहेगा? लोकतंत्र में जनता वोट देती है, लेकिन राजनीति में समीकरण वोट से पहले ही कई बार अपनी पटकथा लिखने लगते हैं। अब देखना यह है कि पटकथा उदयपुर की गलियों में लिखी जाएगी या किसी दूर बैठे राजनीतिक दफ्तर में।
फिलहाल हालात यह हैं कि कोई पैदल भाग रहा है, कोई कार में, कोई बस में और कोई रिश्तेदारों की पूरी बारात लेकर राजनीतिक दरबार में हाजिरी लगा रहा है। मोबाइल फोन लगातार बज रहे हैं, चाय की प्यालियां लगातार भर रही हैं और बंद कमरों में राजनीतिक गणित लगातार घट-बढ़ रहा है। हर किसी के पास अपना उम्मीदवार है, हर उम्मीदवार के पास अपना समीकरण और हर समीकरण के पीछे कोई न कोई ‘बड़ा संपर्क’ होने का दावा!
अब असली परीक्षा चुनाव के दिन होगी। तब न सोटा चलेगा, न लोटा और न ही लंगोटा—चलेंगे सिर्फ मतदाता और उनका वोट। महापौर की कुर्सी का भाग्य आखिरकार किसके खाते में जाता है, यह उदयपुर की जनता तय करेगी या राजनीतिक गलियारों के कथित समीकरण—इसका जवाब आने वाला नगर निगम चुनाव देगा। तब तक सियासी दौड़ जारी रखिए, क्योंकि उदयपुर में चुनाव अभी आया नहीं है… लेकिन चुनावी बुखार पूरी तरह चढ़ चुका है!
