जब पत्रकार ही असुरक्षित हो जाए, तो लोकतंत्र की आवाज़ कौन बनेगा?
दिल्ली की सड़कों पर पत्रकारों के साथ हुई मारपीट, धक्का-मुक्की और सार्वजनिक अपमान के वायरल वीडियो केवल कुछ घटनाएँ नहीं हैं। ये दृश्य भारतीय पत्रकारिता के सामने खड़े उस गहरे संकट की ओर इशारा करते हैं, जिसे अब अनदेखा नहीं किया जा सकता। सवाल केवल इतना नहीं है कि पत्रकारों पर हमला क्यों हुआ, बल्कि इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर समाज का एक वर्ग पत्रकारों के प्रति इतना आक्रोश क्यों महसूस कर रहा है? यह प्रश्न पूरे मीडिया जगत के सामने खड़ा है।
बीते कुछ वर्षों में पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठे हैं। आरोप लगते रहे हैं कि सत्ता, राजनीति, कॉरपोरेट हित और टीआरपी की दौड़ ने समाचारों की निष्पक्षता को प्रभावित किया है। चाहे ये आरोप पूरी तरह सही हों या नहीं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि आम जनता के मन में मीडिया की निष्पक्षता को लेकर संदेह पहले की तुलना में कहीं अधिक गहरा हुआ है। किसी भी लोकतंत्र के लिए यह स्थिति शुभ संकेत नहीं मानी जा सकती।
इसी बीच सोशल मीडिया ने सूचना की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। अब खबर केवल बड़े मीडिया संस्थानों की मोहताज नहीं रही। एक साधारण नागरिक भी घटनास्थल से वीडियो प्रसारित कर सकता है और लाखों लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकता है। यह परिवर्तन मुख्यधारा के मीडिया के लिए एक चुनौती भी है और आत्ममंथन का अवसर भी। यदि जनता का विश्वास वापस पाना है, तो पत्रकारिता को फिर से तथ्यों, निष्पक्षता और जनहित के मूल सिद्धांतों की ओर लौटना होगा।
हालाँकि, यह भी उतना ही स्पष्ट होना चाहिए कि किसी पत्रकार से असहमति का उत्तर हिंसा नहीं हो सकता। कैमरे के पीछे या सामने खड़ा पत्रकार लोकतंत्र की सूचना-व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि पत्रकारों को मैदान में ही अपमानित, पीटा या डराया जाएगा, तो आने वाले समय में स्वतंत्र रिपोर्टिंग करना और अधिक कठिन हो जाएगा। इसका नुकसान अंततः जनता को ही होगा, क्योंकि सच सामने लाने वाले लोगों की संख्या कम होती जाएगी।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि मैदान में रिपोर्टिंग करने वाला पत्रकार अक्सर वही व्यक्ति होता है, जो किसी घटना की सच्चाई जनता तक पहुँचाने के लिए सबसे पहले जोखिम उठाता है। लेकिन यदि बड़े मीडिया संस्थानों की संपादकीय नीतियों पर उठते सवालों का बोझ फील्ड में काम करने वाले पत्रकारों को उठाना पड़े, तो यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी। संस्थानों की गलतियों की कीमत जमीनी पत्रकार चुकाएँ, यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।
आज आवश्यकता इस बात की है कि बड़े मीडिया समूह स्वयं से कठिन प्रश्न पूछें। क्या उनकी प्राथमिकता जनहित है या केवल टीआरपी और राजनीतिक समीकरण? क्या विरोधी विचारों को समान स्थान मिलता है? क्या तथ्यों की निष्पक्ष जाँच पहले जैसी ईमानदारी से हो रही है? इन प्रश्नों के उत्तर केवल मीडिया संस्थानों को ही देने होंगे। यदि समय रहते आत्ममंथन नहीं हुआ, तो जनता और मीडिया के बीच भरोसे की खाई और गहरी होती जाएगी।
यदि यही स्थिति बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब युवा पत्रकार मैदान में जाने से डरने लगेंगे। पत्रकारिता का पेशा, जो कभी साहस, सत्य और जनसेवा का प्रतीक माना जाता था, भय और अविश्वास का पर्याय बन सकता है। यह केवल मीडिया की हार नहीं होगी, बल्कि लोकतंत्र की भी बड़ी हार होगी।
आज सबसे बड़ा प्रश्न किसी एक पत्रकार, किसी एक चैनल या किसी एक मीडिया समूह का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या भारतीय पत्रकारिता अपनी खोती हुई विश्वसनीयता को पुनः स्थापित कर पाएगी? क्योंकि यदि जनता का विश्वास पूरी तरह टूट गया, तो सबसे बड़ा नुकसान किसी मीडिया संस्थान का नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का होगा, जिसकी सबसे मजबूत आवाज़ हमेशा स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता रही है।
